महाशिवरात्रि पर निबंध Essay on Mahashivratri in Hindi

हमने इस आर्टिकल में महाशिवरात्रि त्यौहार पर निबंध (Essay on Mahashivratri in Hindi) लिखा है जिसमे हमने इस पर्व की कथा, महत्व और उत्सव के बारे में वर्णन किया है। महाशिवरात्रि भगवान शिव जी पर आधारित पौराणिक काल से चली आ रही एक भारतीय त्यौहार है। 

प्रस्तावना Introduction

महाशिवरात्रि का पर्व बहुत ही भव्य और महान है। भारत में हर जगह महाशिवरात्रि का पर्व बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। महाशिवरात्रि के दिन शिवजी की पूजा रात को की जाती है। लोग शिवजी के मंदिर को जगमगाती हुई लाइटों से सजाते हैं जो रात्रि को बहुत ही भव्य और सुन्दर दिखते हैं।

महाशिवरात्रि कब है? When is Mahashivratri?

महाशिवरात्रि का पर्व फाल्गुन माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाता है। इस दिन शिव भक्त व्रत रखते हैं और उनकी उपवास रखकर उपासना करते हैं। 

शिवरात्रि का पर्व दो बार आता है एक फागुन के महीने में और दूसरा सावन के महीने में। फाल्गुन महीने की शिवरात्रि को महाशिवरात्रि कहते हैं और सावन महीने की शिवरात्रि को सावन शिवरात्रि कहते हैं। हिंदू देवताओं में सबसे लोकप्रिय देवता शिवजी हैं। वह देवों के देव महादेव हैं। 2020 में महाशिवरात्रि 21 फरवरी को है।

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महाशिवरात्रि पर्व का महत्व Importance of Mahashivratri

महाशिवरात्रि एक हिंदू उत्सव है जो भगवान शिव के सम्मान में मनाया जाता है। महाशिवरात्रि रात में मनाई जाती है। यह भगवान शिव और पार्वती की विवाह को समर्पित है। यह रात सो भक्त और हिंदू धर्म के आध्यात्मिक चिकित्सक इन दोनों के लिए अत्याधिक महत्वपूर्ण है। महाशिवरात्रि की शाम को, भक्त पौराणिक पात्रों के रूप में तैयार होकर भगवान शिव की मंदिर के लिए निकली यात्रा में भाग लेते हैं।

मंदिरों में दिन-रात विविध उत्सव आयोजित होते हैं जिनमें जागरण भी समाविष्ट होता है। ऐसा माना जाता है इस दिन व्रत रखने और पूजा करने से सौभाग्य प्राप्त होता है। माना जाता है कि इस दिन समुद्र मंथन से निकली विराट विष को भगवान शिव ने विश्व की रक्षा के लिए अकेले ही पी लिया जिसके कारण उनका कंठ नीला हो गया। इस कारण उनका नाम नीलकंठ पड़ा।

महाशिवरात्रि पौराणिक कथा Story of Mahashivratri

महाशिवरात्रि पर्व पर वैसे तो बहुत पौराणिक कथाएं है लेकिन हमने आपको उससे संबंधित प्रमुख कहानियां बताई हैं।

शिव और पार्वती का विवाह Marriage story of Lord Shiva and Goddess Parvati

भगवान शिव और पार्वती का विवाह महाशिवरात्रि के दिन संपन्न हुआ था। भगवान शिव त्रिदेव में एक दिए हैं इन्हें देवों के देव महादेव, भोलेनाथ, शंकर, महेश, रुद्रा, दी नाम से भी जाना जाता है। इनका निवास स्थान कैलाश है। पार्वती माता को हिम देश, हिमंगन और मैनावती की थी। इन्हें उमा और गौरी के नाम से भी जाना जाता है। पार्वती माता के जन्म के समय देवर जी महाराज ने कहा था पार्वती का विवाह भगवान शिव से होगा। किंतु भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए इन्हें कठोर तपस्या करनी पड़ी।

इस पर सभी देवता गण सहमत थे की माता पार्वती का विवाह भगवान शिव से ही हो। पार्वती की कठोर तपस्या के चलते पूरे संसार में हाहाकार मच गया। जिसे बड़े-बड़े पर्वतो के न्यू डगमगा ने लगी तब भगवान शिव ने अपनी आंखें खोली खार माता पार्वती को किसी समृद्ध राजा से विवाह करने को कहा लेकिन माता पार्वती अपनी बात पर टिक्की रही उन्होंने साफ मना कर दिया कि यदि और शादी करेंगी तो सिर्फ भगवान शिव से। नहीं तो नहीं करेंग।

पार्वती के जीत के चलते भगवान शिव को माता पार्वती से विवाह करना पड़ा। माता पार्वती से विवाह करने से पहले भगवान शिव ने सप्तऋषि को माता पार्वती के पास उनकी परीक्षा लेने के लिए भेजा। सप्तऋषि ने माता पार्वती को समझाया कि ओ किसी और से शादी कर ले उन्हें इस शादी से सुख की प्राप्ति नहीं होगी। लेकिन माता पार्वती अपने विचारों से टस से मस नहीं हुई।

जिससे सप्तऋषि प्रसन्न हुए और उन्होंने भगवान शिव को सारी बातें बताई। और भगवान शिव ने माता पार्वती से विवाह करने को हां कह दिया। भगवान शिव से दुनिया का हर छोटा से छोटा और बड़ा से बड़ा प्राणी जुड़ा हुआ है। जो उनकी विवाह में शामिल होने को आए। वैसे तो पौराणिक काल से देवता और राक्षसों की बीच्च युद्ध होता आ रहा है।

लेकिन राक्षसी अपने आपसी दुश्मनी भूलकर भगवान कि शादी में शामिल हुए।माना जाता है शिव की बारात में भूत पिशाच कीड़े मकोड़े आदि सभी तरह के लोग शामिल हुए। भगवान शिव एक तपस्वी थे उन्हें यह पता नहीं था कि विवाह के लिए किस प्रकार तैयार हुआ जाता है। तब उन्हें भूत पिशाच इन्होंने राख की बहुत लगाकर और हड्डियों की माला पहनाकर सजाया।

ऐसे बारात को आते देख बारात में खड़े सभी लोग हैरान हो गए। भगवान शिव के ऐसे अद्भुत रूप को देखकर माता पार्वती की मां ने उन्हें अपने बेटी देने से मना कर दिया। तब देवताओं द्वारा भगवान शिव को नहलाया गया। जिसके बाद उन्हें सुन्दर सुन्दर फूलो से सजाया गया।

उन्हें इक सुन्दर रूप दिया गया। भगवान शिव की रूप को देखकर माता पारवती ने उन्हे तुरंत स्वीकार लिया और ब्रम्हा जी की उपस्थिति में विवाह समारोह हुआ। भगवान शिव हाथ में त्रिसुल और दुसरे डमरू लिए विवाह पार्वती माता से संपन हुआ। इसके बाद भगवान शिव माता पार्वती को कैलास पर्वत ले गए।

शिकारी और हिरणों की कहानी Story of hunters and deer

प्राचीन काल में जंगल में गुरु द्रोण नाम का एक शिकारी रहता था जो जंगल के जानवरों का शिकार करके अपने परिवार का भरण पोषण करता था। 1 दिन महाशिवरात्रि के दिन वह शिकार करने निकला पूरे दिन भर खोजने पर उसे एक भी शिकार नहीं मिला। वह चिंता में पड़ गया की मेरे बच्चे और पत्नी को आज दिन भर भूखे रहना पड़ेगा। सूर्यास्त के समय वह जल के लिए एक घाट पर गया वहीं पानी लेकर वह एक पेड़ पर चडगया। क्योंकि उसे उम्मीद थी की कोई ना कोई जानवर जरूर अपनी प्यास बुझाने पानी पीने आएगा। वहां पर एक बेल का पेड़ था जिसके पत्तों के नीचे शिवलिंग था।

 बेलपत्र से ढके होने के कारण वह शिवलिंग दिखाई नहीं दे रहा था। रात का पहला पहर  बीतने के बाद वहां पर एक हिरणी आई उसे देखकर शिकारी ने अपने धनुष पर तीर साधा। ऐसा करते समय उसके हाथ के धक्के से बेल पत्र और जल की कुछ बूदें नीचे बनी शिवलिंग पर जा गीरे। अनजाने में ही शिकारी से पहले पहर की पूजा हो गई। हिरणी ने जब पत्तों की खरखराहट सुनी तब वह घबराकर ऊपर की ओर देखने लगी। तब वह भयभीत होकर शिकारी से कांपते स्वर में बोली मुझे मत मारो। शिकारी ने कहा कि वह और उसका परिवार भूखा है इस कारण उसे वह उसे नहीं छोड़ सकता।

 तब हिरणी ने शिकारी से वादा किया कि वह अपने बच्चों को अपने पति को सौंप कर आ जाएगी। तब वह उसका शिकार कर ले। उसकी बातों पर विश्वास नहीं हो रहा था। हिरणी फिर से  शिकारी को अपनी बातों पर भरोसा करवाया। और उसने कहा – जैसे सत्य पर यह धरती टिकी है, समुद्र अपनी मर्यादा में रहता है और झरनों से जलधाराएं गिरा करती है। शिकारी ने उस हिरणी को जल्दी आना बोलकर जाने दिया। थोड़ी देर बाद एक और हिरणी फिर वहां पर पानी पीने आयी।

 शिकारी सावधान हो गया और फिर पहले की तरह उसके हाथ के धक्के से कुछ पाने के बूंदे और बेलपत्र नीचे बने शिवलिंग पर जा गिरे। अनजाने में फिर शिकारी से दूसरे पहर की पूजा हो गई। इस हिरणी ने अपने जीवन दान की याचना की लेकिन इस बार शिकारी ने मना कर दिया। उसी समय हिरणी ने उसे यह कहकर वचन दिया कि जो वचन देकर पलट जाता है उसका जीवन में संचित पूर्ण नष्ट हो जाता है। उस शिकारी ने दूसरे हिरणी का भी भरोसा किया और उससे जाने दिया।

 वह शिकारी चिंता से व्याकुल हो रहा था कि अगर कोई एक हिरणी भी लौट कर नहीं आएगी तो उसके परिवार का क्या होगा। इतने में ही जल की तरह आते हुए उसने एक हिरण को देखा। तब वह प्रसन्न हो गया और अपने धनुष पर फिर तीर साधा इसी तरह उसकी तीसरी पहर की भी पूजा स्वतः संपन्न हो गई। लेकिन पत्ते की आवाज़ से हिरण सतर्क हो गया और ऊपर की ओर देखा और शिकारी से पुछा – तुम क्या चाहते हो? वह बोला – अपने कुटुंब को पालने के लिए मैं तुम्हारा वध करुंगा।

हिरण प्रसन्न हो गया और कहने लगी कि मैं धन्य हूं जो मेरा शरीर किसी का काम आएगा और मैं अपने इस जीवन में सफल हो जाऊँगा।  लेकिन मैं पहले अपने बच्चों को उसकी माता को सौंप कर आता हूं। शिकारी का ह्रदय पाप पुण्य नष्ट हो जाने से अब तक वह शुद्ध हो गया था इसलिए वह बड़ी विनम्रता से उसे कहा अब तक जितने भी हिरण आए सब कोई न कोई बातें बनाकर यहां से चले गए। और अभी तक नहीं लौटे यदि तुम भी झूठ बोल कर चले जाओगे तो मेरे परिजनों का क्या होगा?

 हिरण ने उसे यह कहकर भरोसा दिलाया कि यदि वह ना आए तो उसे वह पाप लगे जो सामर्थ्य होकर भी दूसरों का परोपकार नहीं करते हैं। शिकारी ने भी उसे जल्दी आना यह कह कर जाने दिया। रात्रि के अंतिम पहर शुरू होने से पहले उस शिकारी का खुशी का ठिकाना ना रहा क्योंकि उसने उन हिरण हिराणियों को अपने बच्चों के साथ आते हुए देख लिया। 

उन्हें देखते ही वह अपने धनुष पर बाण साधा पहले की तरह चौथे पहर की शिव पूजा बी संपन्न हो गई। अब उस शिकारी के शिव कृपा से सभी पाप नष्ट हो गए तब वह सोचने लगा कि ये पशु धन्य है जो अज्ञानी होकर भी अपने शरीर से परोपकार करना चाहते हैं लेकिन धिक्कार है मेरे जीवन को मैं कुरीतियों से अपने परिवार का भरण पोषण करता रहा। उसने अपना बाण रोक दिया और हिरणों से कहा कि वह सब धन्य हैं और और उसने उन्हें वापस जाने दिया। उसका ऐसे करने पर भगवान शिव ने प्रसन्न होकर तत्काल उसे अपने दिव्य शरीर का दर्शन कराया और उसे सुख समृद्धि का वरदान देकर नया नाम प्रदान ।

महाशिवरात्रि की पूजा विधि Puja Vidhi of Shiva Ratri

महाशिवरात्रि के दिन सुबह से उठकर स्नान कर लेना चाहिए उसके बाद शिवजी पर जल और दूध चढ़ाना चाहिए। धूप, पुष्प,, फल चंदन का तिलक, आदि सामग्री लेकर शिव जी की विधिवत पूजा करनी चाहिए। महाशिवरात्रि के दिन बेलपत्र और दूध बहुत ही शुभ माना जाता है। शिवभक्त उस दिन उपवास रखते हैं और ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय का जाप करते रहते हैं। शिवलिंग पर पंचामृत का अभिषेक करना चाहिए। महाशिवरात्रि के दिन धतूरे का फूल, फल, अर्क , बेलपत्र और जल चढ़ाना चाहिए। इसके बाद उन्हें चंदन का टीका लगाना चाहिए। और उनसे प्रार्थना करनी चाहिए।  

निष्कर्ष Conclusion

महाशिवरात्रि शिव जी पर आधारित एक त्यौहार है ।इस त्यौहार को लोग बहुंत ही धूम धाम से मानते है ।महाशिवरात्रि हिन्दुओ का त्यौहार है ।

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